अनुशासन का दूसरा नाम- मास्टर पब्बाराम विश्नोई (मेरे आदर्श)

                         यूँ तो संबंधों का अर्थ अथाह होता है, परंतु कुछ संबंध जीवन में ऐसे बनते हैं, जो हमारे जीवन जीने की दृष्टि ही बदल डालते हैं, या यूँ कहूँ कि जिन्दगी ही बना डालते हैं।

आइये आज के ब्लॉग में ऐसे ही एक संबंध का परिचय करवाता हूँ, जिनका इस नादां के जीवन में गुरु के रूप में सर्वोच्च स्थान है...

हालांकि वे मुझे आज भी नहीं पहचानते हैं, पर वे इस नादां के लिए देवतुल्य हैं... इसलिये नहीं कि वे आज विधायक हैं, बल्कि इसलिये कि वे सही मायनों में एक बेहद अनुशासित फौजी, एक आदर्श शिक्षक, उच्चतम प्रतिमान स्थापित करने वाले प्रधानाचार्य, और एक अनुकरणीय व्यक्तित्व थे, हैं और रहेंगे।

5वीं कक्षा तक पिताजी की नियुक्ति वाली स्कूल से पढने के बाद अब ढाणी से 2km दूर गाँव की Senior स्कूल में प्रवेश लेना था, ज़ाहिर सी बात थी कि अब वहाँ कोई अपने बाप का स्कूल नहीं था।

सभी ने बताया, बेटा! अब तेरे नखरे नहीं चलेंगे वहाँ, तरीके से और रोज़ाना स्कूल जाना पड़ेगा, ध्यान रखना वहाँ पापा का नहीं बल्कि पब्बाराम का राज़ चलता है।
पहली बार मेरे पितामह तुल्य आदरणीय "मास्टर" पब्बाराम विश्नोई का नाम सुना था, गाँव वाली Senior School में जाना अपने आप में उत्साह का विषय तो था, लेकिन दिल मारे डर के काँप रहा था, कैसे होंगे पब्बाराम जी?, सबको ही पीटते होंगे क्या? मैं तो बदमाशियाँ नहीं करूँगा, मुझे भी पीटेंगे क्या? इत्यादि प्रश्न मेरे भयभीत बाल मन में चलकदमी कर रहे थे....

चूँकि मैं मेरे दादाजी का सबसे लाड़ला पोता था, तो वे मेरे प्रवेश के लिए मेरे साथ आये थे... मैं दादाजी के पीछे-पीछे चल तो रहा था, लेकिन पब्बाराम जी के Office की तरफ़ बढ़ते मेरे पैर कत्थक, कुचिपुड़ी जैसे सभी तरह के शास्त्रीय नृत्य कर रहे थे। लेकिन जब दादाजी हो साथ तो फिर डरने की क्या बात...

बेहद अनुशासित, सुसज्जित और व्यवस्थित उस कार्यालय में एक बड़ी टेबल, जिस पर एक Folding Calender, एक ग्लोब, एक सुन्दर सा पेन होल्डर, रखा था, पर चश्मा पहने, लगभग 7 फीट की Height और फौजियाना रुआब के साथ बैठे थे, प्रधानाचार्य श्री पब्बाराम विश्नोई...

दादाजी दरवाजे पर प्रवेश की अनुमति के लिए खड़े थे, मैं उनके पीछे दुबका, झाँक रहा था, उनका ध्यान अपने काम में था, ज्योंहीं उन्होंने दादाजी को देखा, अपने स्थान पर खड़े हो गए, हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और स्वयं दूसरी कुर्सी ले कर दादाजी की बगल में आ कर बैठ गए। ये देख मेरा सारा डर ऐसे गायब हुआ जैसे नाऽरायण, नाऽरायण के बाद नारदजी... उन्होंने हमें पानी पिलवाया, दादाजी से तबियत, खेती-बाड़ी, धीणों, घर-परिवार इत्यादि समाचार पूछे, मेरे सिर पर हाथ फेरा और इस काम के लिये तो आप धर्मा (मेरे पिताजी) को ही भेज देते, आपने क्यूँ तकलीफ देखी, कहते हुए बाबूजी को मेरे प्रवेश के लिए कह दिया... बस पब्बाराम जी इस नादां के दिल में उसी दिन से सर्वोच्च स्थान पर आ गए। उनसे डर का स्थान उनके प्रति सम्मान ने ले लिया था। और अब खुशी-खुशी तैयार था मैं रोज़ाना और तरीके से School जाने के लिए।

छुट्टी के बाद बड़े गेट से निकलते समय 12वीं कक्षा के 2 नव प्रवेशी लड़कों ने बहुत तेज़ी से Bike निकाली, और  रास्ते में चल रही लड़कियों पर टिप्पणी करते हुए फर्राटे के साथ चले गए...

अगले दिन प्रार्थना सभा में बेहद गम्भीर सन्नाटा पसरा  था। प्रार्थना हुई, प्रेरक प्रसंग सुनाया गया, अखबार पढा गया, प्रश्नोत्तर हुए, उपस्थिति हुई, और अब बारी थी पब्बाराम जी के निर्देशों की, वे आये, और Army के Chief की भाँति लरजती-गरजती और गुस्से से भरी आवाज के साथ, सीधे उन दोनों लड़कों का नाम लेते हुए गरज पड़े, उनको प्रार्थना सभा में आगे बुलाया और Army वाले ही अंदाज में उन पर जम के बरस पड़े, चोरी के ऊपर सीनाजोरी वाले लोगों के लिए वे सिर्फ Army Rule ही Apply करते थे, वहीं अखबार पठन के बाद वे प्रश्न पूछते थे, उसका जवाब देने वालों पर स्नेह के समुद्र उड़ेल दिया करते थे।

बदमाशी के लिए कठोर दण्ड और होनहार के लिए उनका पुरस्कार का यह तरीका, न जाने कितनों की जिन्दगी बना चुका था, कितनों के गलत रास्ते छुड़वा चुका था, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है...

खैर उन लड़कों का नाम पृथक् कर उन्हें घर भेज दिया गया, और पिताजी को बुलवा लाने के बाद ही वापस नाम जोड़े जाने का अल्टीमेटम दे दिया। 

चूँकि ब्लॉग काफी लम्बा हो चुका है, अतः शेष अगले ब्लॉग में....

टिप्पणियाँ

वाकयी एक प्रेरणादायी व्‍यक्तित्‍व, जिनकी वज़ह से कई लोगों की जिंदगी सुधरी है......... शानदार लेखनी, शानदार भाव
Unknown ने कहा…
हमारे सदैव आदर्श रहेंगे प्रधानाचार्य जी और आज भी अपने कार्य फील्ड में बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं सराहनीय है भगवान उनको एक अच्छी सेहत और अच्छा नाम दें इसी के साथ जय गुरुदेव
Unknown ने कहा…
हमारे सदैव आदर्श रहेंगे प्रधानाचार्य जी और आज भी अपने कार्य फील्ड में बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं सराहनीय है भगवान उनको एक अच्छी सेहत और अच्छा नाम दें इसी के साथ जय गुरुदेव.
गुरु देवो गुरुवे नमः
श्याम सुमन ने कहा…
समाज मे ऐसे लोगों का होना ही एक गर्व की बात है।
🙏🙏🙏🙏
Unknown ने कहा…
जितना आपने पूर्व प्राचार्य हमारे गुरुदेव तथा वर्तमान विधायक पब्बाराम जी के बारे में बताया बिल्कुल उसी अनुरूप वे बेहद सरल व्यक्तित्व के धनी हैं। आप बहुत अच्छा लिखते हैं अपनी लेखनी अनवरत रखे ।।साभार।।
Vishnu Trivedi ने कहा…
चरित्र तो 👌👌👌 है ही, साथ में चित्रण...लाजवाब👌👌👌
Satya Jog Rao ने कहा…
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार भाई भजनलाल जी, आपका ये स्नेह सदैव बना रहे सा...🤗🙏
Satya Jog Rao ने कहा…
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार, आपका ये स्नेह सदैव बना रहे सा...🤗🙏
Satya Jog Rao ने कहा…
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार, आपका ये स्नेह सदैव बना रहे सा...🤗🙏
दरअसल आपका नाम टिप्पणी में प्रदर्शित नहीं हुआ है, आपका शुभ नाम भी बता दीजिये श्रीमान...🤗🙏
Satya Jog Rao ने कहा…
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार श्याम जी, आपका ये स्नेह सदैव बना रहे सा...🤗🙏
Satya Jog Rao ने कहा…
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार, आपका ये स्नेह सदैव बना रहे सा...🤗🙏
दरअसल आपका नाम टिप्पणी में प्रदर्शित नहीं हुआ है, आपका शुभ नाम बताने की कृपा करें श्रीमान...🤗🙏
Satya Jog Rao ने कहा…
बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए बहुत-बहुत आभार, मैं लिखना अवश्य जारी रखूँगा सा, आपका ये स्नेह सदैव बना रहे सा...🤗🙏
दरअसल आपका नाम टिप्पणी में प्रदर्शित नहीं हुआ है, आपका शुभ नाम बताने की कृपा करें श्रीमान...🤗🙏
Satya Jog Rao ने कहा…
आपकी इस अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आदरणीय, आपका स्नेह सदैव बना रहे सा.....🤗🙏
Unknown ने कहा…
DINESH SARSWAT LOHAWAT. HAL NAGALAND