अनुशासन का दूसरा नाम- मास्टर पब्बाराम विश्नोई (मेरे आदर्श)
यूँ तो संबंधों का अर्थ अथाह होता है, परंतु कुछ संबंध जीवन में ऐसे बनते हैं, जो हमारे जीवन जीने की दृष्टि ही बदल डालते हैं, या यूँ कहूँ कि जिन्दगी ही बना डालते हैं। आइये आज के ब्लॉग में ऐसे ही एक संबंध का परिचय करवाता हूँ, जिनका इस नादां के जीवन में गुरु के रूप में सर्वोच्च स्थान है... हालांकि वे मुझे आज भी नहीं पहचानते हैं, पर वे इस नादां के लिए देवतुल्य हैं... इसलिये नहीं कि वे आज विधायक हैं, बल्कि इसलिये कि वे सही मायनों में एक बेहद अनुशासित फौजी, एक आदर्श शिक्षक, उच्चतम प्रतिमान स्थापित करने वाले प्रधानाचार्य, और एक अनुकरणीय व्यक्तित्व थे, हैं और रहेंगे। 5वीं कक्षा तक पिताजी की नियुक्ति वाली स्कूल से पढने के बाद अब ढाणी से 2km दूर गाँव की Senior स्कूल में प्रवेश लेना था, ज़ाहिर सी बात थी कि अब वहाँ कोई अपने बाप का स्कूल नहीं था। सभी ने बताया, बेटा! अब तेरे नखरे नहीं चलेंगे वहाँ, तरीके से और रोज़ाना स्कूल जाना पड़ेगा, ध्यान रखना वहाँ पापा का नहीं बल्कि पब्बाराम का राज़ चलता है। पहली बार मेरे पि...