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अनुशासन का दूसरा नाम- मास्टर पब्बाराम विश्नोई (मेरे आदर्श)

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                         यूँ तो संबंधों का अर्थ अथाह होता है, परंतु कुछ संबंध जीवन में ऐसे बनते हैं, जो हमारे जीवन जीने की दृष्टि ही बदल डालते हैं, या यूँ कहूँ कि जिन्दगी ही बना डालते हैं। आइये आज के ब्लॉग में ऐसे ही एक संबंध का परिचय करवाता हूँ, जिनका इस नादां के जीवन में गुरु के रूप में सर्वोच्च स्थान है... हालांकि वे मुझे आज भी नहीं पहचानते हैं, पर वे इस नादां के लिए देवतुल्य हैं... इसलिये नहीं कि वे आज विधायक हैं, बल्कि इसलिये कि वे सही मायनों में एक बेहद अनुशासित फौजी, एक आदर्श शिक्षक, उच्चतम प्रतिमान स्थापित करने वाले प्रधानाचार्य, और एक अनुकरणीय व्यक्तित्व थे, हैं और रहेंगे। 5वीं कक्षा तक पिताजी की नियुक्ति वाली स्कूल से पढने के बाद अब ढाणी से 2km दूर गाँव की Senior स्कूल में प्रवेश लेना था, ज़ाहिर सी बात थी कि अब वहाँ कोई अपने बाप का स्कूल नहीं था। सभी ने बताया, बेटा! अब तेरे नखरे नहीं चलेंगे वहाँ, तरीके से और रोज़ाना स्कूल जाना पड़ेगा, ध्यान रखना वहाँ पापा का नहीं बल्कि पब्बाराम का राज़ चलता है। पहली बार मेरे पि...

सीख राष्ट्रभक्ति की....

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                     बात तब की है जब भारत-चीन के मध्य डोकलाम विवाद गरमाया था। प्रत्येक भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति चरम पर थी। हर कोई चीन को कोस रहा था। कोई चीनी सामान का बहिष्कार कर रहे थे, तो कोई होलिका में चीनी खिलौने अर्पित कर रहे थे, कोई चीनी फिल्मों की मिंची-मिंची आँखों वाली नायिकाओं का बायकॉट कर रहे थे, तो कईयों ने Social Media पर भी चीन के विरुद्ध अग्रिम मोर्चा खोल रखा था। हालांकि कुछ जुबानी सूरमा चीन की माँ-बहनों के लिए गंदी टिप्पणियाँ कर हमारे भारतवर्ष की श्रेष्ठतम संस्कृति और विश्वगुरु की छवि को धूमिल करने से भी बाज नहीं आ रहे थे। खैर मेरा मुद्दा यहाँ भारत-चीन नहीं, मैं तो बस एक विचार आपके सामने रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ....... चीन के विरुद्ध इस बहिष्कार अभियान में मैं भी जोरो-शोरों से लगा हुआ था, सीमा पर जा कर दो-दो हाथ करना तो अपनी औकात की बात नहीं थी, इसलिये Social Media के रण-बाँकुरों की जी-तोड़ मदद कर रहा था। खुद के फोन से लगभग सभी Chinese App हटा दिये और सभी Apps पर घटिया Reviews भी दे डाले, घर पर कोई भी Chinese P...

निरुत्तर (Unanswered)

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For English... Please Scroll Down👇 बात हम बाप-बेटे के बीच की है, परंतु है थोड़ी खास...               "मंगल भवन अमंगल हाऽऽरी...." धुन के साथ ही हृदय को हर्ष से सराबोर कर देने वाली और दिलों में आस्था का समुद्र  छलका देने वाली रामानंद सागर की 'रामायण' का एपिसोड खत्म हुआ ही था, कि थोड़ी देर बाद अखिलेश जोग राव (उम्र 6 साल)  पूछने लगा,  पापा!,  ये नल -नील ने  पानी में पत्थर फेंके थे, वे डूबे नहीं थे ना?  मैंने कहा, हाँ, बेटा, नहीं डूबे थे।  "क्यों?", उसका अगला प्रश्न तैयार था, मैंने जवाब दिया, बेटा नल-नील को एक महर्षि का श्राप था कि वे जो भी चीज पानी में फेंकेंगे, वह डूबेगी नहीं।  "तो पापा उन्होंने उस पर श्रीराम क्यों लिखा था?"  अखिलेश के प्रश्न खत्म नहीं हो रहे थे, उसकी जिज्ञासा मेरे ज्ञान की कड़ी परीक्षा ले रही थी और मुझे B.Ed. BSTC की पाठ योजनाओं के प्रस्तावना प्रश्नों की याद आ रही थी।   खैर, मैंने उसे जवाब दिया, बेटा! उन्होंने श्रीराम का नाम लिखा, यह उनकी श्रीराम के प्रति श्रद्धा थी। "राम" नाम के ...