सीख राष्ट्रभक्ति की....
बात तब की है जब भारत-चीन के मध्य डोकलाम विवाद गरमाया था। प्रत्येक भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति चरम पर थी। हर कोई चीन को कोस रहा था। कोई चीनी सामान का बहिष्कार कर रहे थे, तो कोई होलिका में चीनी खिलौने अर्पित कर रहे थे, कोई चीनी फिल्मों की मिंची-मिंची आँखों वाली नायिकाओं का बायकॉट कर रहे थे, तो कईयों ने Social Media पर भी चीन के विरुद्ध अग्रिम मोर्चा खोल रखा था।
हालांकि कुछ जुबानी सूरमा चीन की माँ-बहनों के लिए गंदी टिप्पणियाँ कर हमारे भारतवर्ष की श्रेष्ठतम संस्कृति और विश्वगुरु की छवि को धूमिल करने से भी बाज नहीं आ रहे थे।
खैर मेरा मुद्दा यहाँ भारत-चीन नहीं, मैं तो बस एक विचार आपके सामने रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ.......
चीन के विरुद्ध इस बहिष्कार अभियान में मैं भी जोरो-शोरों से लगा हुआ था, सीमा पर जा कर दो-दो हाथ करना तो अपनी औकात की बात नहीं थी, इसलिये Social Media के रण-बाँकुरों की जी-तोड़ मदद कर रहा था। खुद के फोन से लगभग सभी Chinese App हटा दिये और सभी Apps पर घटिया Reviews भी दे डाले, घर पर कोई भी Chinese Product उपयोग न करने की हिदायत दे दी। यहाँ तक की श्रीमती जी के फोन से भी चाइनीज़ का सफाया कर दिया था।
इस मशक्कत में मैं ये भूल चुका था, कि एक "प्रश्नों का Encyclopedia" मेरे पास ही बैठा है।
तपाक से पूछ बैठा, "पापा!, हम इस चाइना का विरोध क्यों कर रहे हैं?" मैंने कहा, "बेटा!, ये चाइना हमारी ज़मीन पर कब्जा करना चाहता है, हमारे सैनिकों को मारता है, इसलिये हम चाइना का विरोध कर रहे हैं।"
उसका अगला प्रश्न तैयार था, "तो पापा!, ये जो चाइना का सामान जला रहे हैं, ये तो इन्होंने खरीदा होगा ना?" मैं समझ तो चुका था कि अब फँसना तय है, फिर भी मैंने कहा, "हाँ बेटा, खरीदा ही होगा।"
"तो पापा अब इस सामान को जलाने से चाइना को कैसे नुकसान होगा, ये तो अब हमारा नुकसान ही हुआ ना?" उसका यह प्रश्न मेरी नज़र में मेरे जैसे बहुत से राष्ट्रभक्तों के तरीकों पर प्रश्नचिह्न लगाने को काफी था। खैर मैंने उससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चाइना की बदनामी होगी कहकर, अखिलेश को तो चुप करवा लिया, परंतु मेरे मन में बीजारोपण हो गया था, एक नये द्वंद्व का। क्या बहिष्कार का ये तरीका सही था। या कुछ ऐसा उत्पादक कार्य किया जा सकता था, जिससे कोई एक चाइना के सामान को मैं आस-पास में ही बिक्री होने से रोक पाता।
बहरहाल, कुछ दिनों से वो बार-बार ज़िद कर रहा था, पापा मुझे दूरबीन ला दो, दूरबीन ला दो। बस एक अच्छी दूरबीन मिल नहीं पा रही थी। तो क्या, Flipcart और Amazon तो जिंदाबाद है ही, बस फिर क्या था, दूरबीन Search करके फोन पकड़ा दिया उसे।
"पापा! ये देखो",
ये अच्छी नहीं है बेटा, इसमें Reviews अच्छे नहीं है।
"तो, ये!"
नहीं बेटा, इसमें पैसे बहुत ज्यादा लग रहे हैं।
उसने बहुत सी दूरबीनें पसंद की, दिखायी, परंतु हर बार Quality, Rate या Reviews के आधार पर टाली जा रहीं थीं, वो हतोत्साहित हो गया, और फोन बंद कर, उदास चेहरा, और उस उदास चेहरे पर झूठी मुस्कान लिए बैठ गया।
मुझसे रहा नहीं गया, दरअसल सभी दूरबीन लगभग Made In China थीं, इसलिये टाल रहा था, लेकिन बच्चे का मन देख, उसकी सबसे पसंदीदा दूरबीन Order कर दी। उसे बेसब्री से Flipcart वाले भैया का इन्तजार था।
अचानक उसने 2 दिन बाद पूछा, "पापा!, वो दूरबीन अपने India में बनी है ना, China की तो नहीं है न?"
मैंने कहा, "तुझे दूरबीन चाहिए न?, तो बस आ जाने दे।"
"पापा!, फिर भी बता तो दो" मैंने कहा, "Made In China ही है बेटा"
"ओ पापा! ये क्या किया आपने, चाइना तो हमारे सैनिकों को मारता है, हमारी ज़मीन छीन लेता है, हमें उसका बनाया सामान नहीं खरीदना चाहिए, आप भूल गए क्या? इसे अभी के अभी Order Cancel करो।" वो एक साँस में पूरे आत्मविश्वास के साथ बोल गया।
और मेरा आत्मविश्वास!!!!
वो टूट गया था,
या शायद था ही नहीं....
टिप्पणियाँ
हार्दिक आभार आपका...😊🙏
इस ओर ध्यान किसी का गया ही नही।
आपके ब्लोग से लोगों का नजरिया जरूर बदलेगा